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होली के रंग


Wasi BastaviWasi Bastavi, a JNU student, has submitted the following song on Holi. 😀  You can also submit poems/articles on Holi and it will be published here.

जब हो मौसम ही क़िस्मत से इतना हसीं
क्या है अपना, बेगाना मेरे हम-नशीं
सारे रंगों को तू आज भूल जा
आजा होली के रंगों में डूब जा

खोई खोई है क्यों ऐसे बाली उमर
रंग ले, रंग ले तू रंगों में अपनी चुनर
रंग ही रंग उट्ठे जिधर ये नज़र
कोई थिरके इधर, कोई थिरके उधर
कोई मदहोश है तो कोई बेख़बर
मस्त है आसमां, मस्त है ये ज़मीं
जब हो मौसम ही क़िस्मत से इतना हसीं
क्या है अपना, बेगाना मेरे हम-नशीं
सारे रंगों को तू आज भूल जा
आजा होली के रंगों में डूब जा

बाबू होली के दिन ये बड़े मनचले
लेके आये बहारों के ये सिलसिले
दिल के रंगों से जो रंग दिल के मिले
हो गये दूर सारे ही शिकवे गिले
मिल ले, मिल ले ख़ुशी में गले से गले
बीत जाये न खुशियों का ये दिन कहीं
जब हो मौसम ही क़िस्मत से इतना हसीं
क्या है अपना, बेगाना मेरे हम-नशीं
सारे रंगों को तू आज भूल जा
आजा होली के रंगों में डूब जा

जोश ऐसा के सूरज भी बे नूर है
लेप ऐसा ,के किशमिश भी अंगूर है
जशन ऐसा के हर कोई मसरूर है
कोई बह्का, नशे में कोई चूर है
कोई बेबस, न ही कोई मजबूर है
आज कोई किसी की भी सुनता नहीं
जब हो मौसम ही क़िस्मत से इतना हसीं
क्या है अपना, बेगाना मेरे हम-नशीं
सारे रंगों को तू आज भूल जा
आजा होली के रंगों में डूब जा

Copyrighted to:
Wasi Bastavi
260, Sabarmati Hostel, J.N.U.
New Delhi.

2 Comments leave one →
  1. Rajesh Ravi permalink
    March 2, 2010 1:12 PM

    होली मेरे गांव में,

    होती थी धूमधाम से।

    मांगते थे पंचगोंइठा और लकडि़यां,

    होलिका जलती थी शान से।।

    होती थी प्रतिष्‍ठा इसमें कि होलिका की लपटें खूब ऊंची उठें,

    लोग समझ सकें कि जल उठे सब गिले शिकवे।

    होलिका की राख जाती थी सबके घर में,

    लगता था शांति, समृद्धि और सद्भाव का आशीर्वाद मिला।।

    फिर शुरू हो जाती थी कीचड़ की होली,

    नदी में कीचड़ के साथ धुल जाते थे आपस के वैमनस्‍य।

    रंगों की होली से पहले ही पावन हो जाता था तन-मन,

    एक दूजे को सराबोर कर प्रेम की डोर में बंध जाते थे सब।

    सांझ ढलने तक सामने होता था एक नया जीवन,

    नव सृजन की उम्‍मीदों से भरा।।

    होली की वह परम्‍परा अब नहीं रही मेरे गांव में,

    नहीं रह गया है कोई सरोकार होलिका से।

    बस औपचारिकता में कुछ लोग जला देते हैं होलिका,

    न कोई मांगता है लकड़ी न पंचगोंइठा।।

    अब नहीं जल पाते आपस के गिले शिकवे,

    लोग अपने-अपने घरों में खेलते हैं सिर्फ रंगों की होली।

    आपस में नहीं मिल पाते दिल,

    नालियों में आकर मिलते हैं होली के रंग।।

    बना रहता है एक दूसरे के प्रति ईर्ष्‍या और द्वेष,

    नहीं हो पाती है नव सृजन की शुरुआत।

    बोझिल ही बना रहता है जीवन,

    वर्ष पर्यंत उदास और संशयित बना रहता है मेरा गांव।

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  1. Hindi poem on Holi | Emotionally Speaking

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